
जहाँ श्रीमद्भागवत का प्रथम श्रवण हुआ
मान्यता है कि लगभग 5000 वर्ष पूर्व यहीं महर्षि शुकदेव जी (महर्षि वेदव्यास जी के पुत्र) ने अभिमन्यु-नंदन राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण का सात दिवसीय दिव्य श्रवण कराया था। राजा परीक्षित, जिन्हें सर्पदंश से मृत्यु का शाप मिला था, इस कथा-श्रवण से मोक्ष को प्राप्त हुए।
इसी पावन स्मृति को जीवंत रखते हुए यह स्थल आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष के अमृत का प्रतीक बना हुआ है।
“यहीं से भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का अमृत प्रवाहित हुआ।”
