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श्री शुकदेव आश्रम, शुकतीर्थ
जीर्णोद्धारक • शिक्षा ऋषि

स्वामी कल्याण देव जी महाराज

1876 — 2004

शिक्षा, सेवा और समरसता को जीवन-व्रत बनाकर भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम, शुकतीर्थ का जीर्णोद्धार करने वाले महान संत, जिनका सम्पूर्ण जीवन समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान को समर्पित रहा।

1876

जन्म वर्ष

250+

स्थापित संस्थाएँ

100+

जनसेवा वर्ष

2000

पद्म भूषण सम्मान

स्वामी कल्याण देव जी

ब्रह्मलीन वीतराग स्वामी कल्याण देव जी महाराज

✦ प्रारम्भिक जीवन एवं साधना ✦

सत्य की खोज से संन्यास तक

वीतराग स्वामी कल्याण देव जी का जन्म सन् 1876 में उत्तर प्रदेश के जनपद बागपत के ग्राम कोताना में एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन का नाम कालूराम था, और उनका बाल्यकाल मुंडभर जनपद मुज़फ्फरनगर में व्यतीत हुआ। बाल्यावस्था से ही उनमें गहन आध्यात्मिक प्रवृत्ति थी, जिसके कारण उन्होंने अल्पायु में ही सत्य की खोज में घर त्याग दिया।

अयोध्या और हरिद्वार होते हुए वे साधु-संतों की संगति में भ्रमण करते रहे। सन् 1900 में मुनि की रेती, ऋषिकेश में उन्होंने स्वामी पूर्णानन्द जी से संन्यास दीक्षा ग्रहण की। गुरु ने ही उन्हें ‘कल्याण देव’ नाम प्रदान किया। इसके पश्चात उन्होंने हिमालय की गोद में वर्षों तप किया।

“यदि ईश्वर के दर्शन करने हैं, तो निर्धन की झोंपड़ी में जाओ।”

स्वामी विवेकानन्द जी के इस उद्घोष से 1902 की भेंट में गहराई से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन समाज-सेवा को समर्पित करने का संकल्प लिया।

✦ जीवन-यात्रा ✦

एक शताब्दी की सेवा-यात्रा

  1. 1876

    जन्म

    ग्राम कोताना, जनपद बागपत (उत्तर प्रदेश) में एक कृषक परिवार में जन्म। बचपन का नाम कालूराम था; बाल्यकाल मुंडभर गाँव, मुज़फ्फरनगर में व्यतीत हुआ।

  2. बाल्यावस्था

    सत्य की खोज में गृह त्याग

    धार्मिक प्रवृत्ति के कारण अल्पायु में ही घर त्याग दिया और अयोध्या, हरिद्वार होते हुए साधु-संतों की संगति में सत्य की खोज प्रारम्भ की।

  3. 1900

    संन्यास दीक्षा

    मुनि की रेती, ऋषिकेश में स्वामी पूर्णानन्द जी से दीक्षा ग्रहण की। गुरु ने उन्हें 'कल्याण देव' नाम प्रदान किया, तत्पश्चात हिमालय में तप एवं अध्ययन में समय व्यतीत किया।

  4. 1902

    स्वामी विवेकानन्द से भेंट

    स्वामी विवेकानन्द के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए, जिसने उनके जीवन को समाज-सेवा के मार्ग की ओर मोड़ा।

  5. 1915

    महात्मा गांधी से भेंट

    साबरमती आश्रम में महात्मा गांधी से भेंट हुई, जिसने रचनात्मक समाज-सेवा के प्रति उनके संकल्प को और दृढ़ किया।

  6. 1920 – 2000

    शिक्षा एवं सेवा का महाअभियान

    पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब में विद्यालय, महाविद्यालय, संस्कृत पाठशालाएँ, कृषि केंद्र, गौशालाएँ एवं चिकित्सालय सहित लगभग 250 संस्थाओं की स्थापना की।

  7. 12 नवंबर 1945

    सिद्ध भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम का जीर्णोद्धार

    शुकतीर्थ में महर्षि शुकदेव जी से संबद्ध पावन स्थल का जीर्णोद्धार कर श्री शुकदेव आश्रम एवं सेवा समिति की स्थापना की।

  8. 2004

    ब्रह्मलीन

    14 जुलाई 2004 को ब्रह्मलीन हुए। अपनी सेवा-यात्रा का दायित्व शिष्य परम पूज्य स्वामी ओमानन्द जी महाराज को सौंपा। शुकतीर्थ में उनकी समाधि आज भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा-स्रोत है।

✦ जीवन-व्रत ✦

‘शिक्षा ऋषि’ का संकल्प

‘शिक्षा ऋषि’ के नाम से विख्यात वीतराग स्वामी कल्याण देव जी महाराज ने ग्रामीण एवं वंचित समाज के उत्थान के लिए शिक्षा को अपना प्रमुख माध्यम बनाया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब में उन्होंने विद्यालय, महाविद्यालय, संस्कृत पाठशालाएँ, तकनीकी संस्थान, कृषि केंद्र, गौशालाएँ एवं चिकित्सालय सहित लगभग 250 से ज्यादा संस्थाओं की स्थापना की।

शिक्षा

ग्रामीण एवं वंचित समाज के उत्थान हेतु विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं तकनीकी संस्थाओं की स्थापना — कन्या-शिक्षा पर विशेष बल।

सेवा

गौशालाओं, चिकित्सालयों एवं कृषि केंद्रों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुँचाने का जीवनभर का संकल्प।

समरसता

छुआछूत एवं जातिगत भेदभाव के विरुद्ध निरंतर प्रयास; समाज में समानता, सौहार्द एवं करुणा का संदेश।

✦ गणमान्य भेंट ✦

जिन गणमान्य व्यक्तियों से भेंट हुई

सेवा-यात्रा के दौरान स्वामी जी से मिलने आए संत, आचार्य एवं विशिष्ट अतिथिगण।

✦ सम्मान एवं मान्यता ✦

राष्ट्र का सम्मान

उनकी सेवा-भावना से प्रेरित होकर देश के राष्ट्रपतियों एवं प्रधानमंत्रियों ने भी उनका आशीर्वाद लिया। भारत सरकार ने उनके जनसेवा कार्यों को इन सम्मानों से अभिनन्दित किया।

1982

पद्म श्री

समाज सेवा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा प्रदत्त सम्मान।

1994

नन्द नैतिक पुरस्कार

नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों के संवर्धन हेतु सम्मान।

2000

पद्म भूषण

भारत के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित।

2002

मानद डी.लिट.

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा मानद उपाधि।

2002

मानद डी.लिट.

सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ।

पद्मश्री, पद्मभूषण, शिक्षाऋषि, तीन सदी के द्रष्टा, 129 वर्षीय, वीतराग परम पूज्य स्वामी कल्याण देव की अंतिम विदाई पर उमड़ा श्रद्धा का जन-सैलाब।

14 जुलाई 2004 — लाखों श्रद्धालुओं ने दी अंतिम विदाई

✦ ब्रह्मलीन एवं विरासत ✦

अंतिम विदाई और अखंड परम्परा

अंतिम दर्शन

14 जुलाई 2004 को वीतराग स्वामी कल्याण देव जी महाराज शुकतीर्थ स्थित आश्रम में ब्रह्मलीन हुए। समाचार फैलते ही देश भर से संत-महात्मा, ट्रस्ट के पदाधिकारी, शिष्यगण एवं दूर-दूर से आए लाखों श्रद्धालु अंतिम दर्शन हेतु शुकतीर्थ पहुँचे और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

समाधि

शुकतीर्थ आश्रम परिसर में ही उनकी समाधि बनाई गई, जो आज श्रद्धालुओं के लिए दर्शन एवं प्रेरणा का केंद्र है। प्रतिवर्ष 14 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पूरे आश्रम परिवार द्वारा श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाई जाती है।

उत्तराधिकार

ब्रह्मलीन होने से पूर्व उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य स्वामी ओमानन्द ब्रह्मचारी जी (स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी) को अपनी सम्पूर्ण सेवा-यात्रा एवं आश्रम का दायित्व सौंपा। वे ही आश्रम के अगले पीठाधीश्वर बने और आज भी गुरु परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।

एक अखंड परम्परा की विरासत

वीतराग स्वामी कल्याण देव जी महाराज का जीवन शिक्षा, सेवा और समरसता का जीवंत उदाहरण है। उनकी स्थापित परम्परा आज परम पूज्य स्वामी ओमानन्द जी महाराज के नेतृत्व में भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम, शुकतीर्थ में निरंतर प्रवाहित हो रही है।