
ब्रह्मलीन वीतराग स्वामी कल्याण देव जी महाराज
सत्य की खोज से संन्यास तक
वीतराग स्वामी कल्याण देव जी का जन्म सन् 1876 में उत्तर प्रदेश के जनपद बागपत के ग्राम कोताना में एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन का नाम कालूराम था, और उनका बाल्यकाल मुंडभर जनपद मुज़फ्फरनगर में व्यतीत हुआ। बाल्यावस्था से ही उनमें गहन आध्यात्मिक प्रवृत्ति थी, जिसके कारण उन्होंने अल्पायु में ही सत्य की खोज में घर त्याग दिया।
अयोध्या और हरिद्वार होते हुए वे साधु-संतों की संगति में भ्रमण करते रहे। सन् 1900 में मुनि की रेती, ऋषिकेश में उन्होंने स्वामी पूर्णानन्द जी से संन्यास दीक्षा ग्रहण की। गुरु ने ही उन्हें ‘कल्याण देव’ नाम प्रदान किया। इसके पश्चात उन्होंने हिमालय की गोद में वर्षों तप किया।
“यदि ईश्वर के दर्शन करने हैं, तो निर्धन की झोंपड़ी में जाओ।”
स्वामी विवेकानन्द जी के इस उद्घोष से 1902 की भेंट में गहराई से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन समाज-सेवा को समर्पित करने का संकल्प लिया।
